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अथर्ववेद

Kanda 10 • Sukta 4 • Mantra 23

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 10 • सूक्त 4 • मन्त्र 23

10.4.23

Mantra ID: 10.4.23

ये अ॑ग्नि॒जा ओ॑षधि॒जा अही॑नां॒ ये अ॑प्सु॒जा वि॒द्युत॑ आबभू॒वुः । येषां॑ जा॒तानि॑ बहु॒धा म॒हान्ति॒ तेभ्यः॑ स॒र्पेभ्यो॒ नम॑सा विधेम ॥ (२३)

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अथर्ववेद मन्त्र 10.4.23 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अग्नि, जड़ीबूटियों, जल एवं सर्पो में जो विष है तथा जिन के द्वारा भयानक कर्म हुए हैं, हम उन सभी सर्पों को हव्य द्वारा तृप्त करते हैं. (२३)

EN English Translation

The poison in agni, herbs, water and serpents and through which terrible deeds have been done, we satisfy all those snakes with lust. (23)

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