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अथर्ववेद

Kanda 10 • Sukta 5 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 10 • सूक्त 5 • मन्त्र 2

10.5.2

Mantra ID: 10.5.2

इन्द्र॒स्यौज॒ स्थेन्द्र॑स्य॒ सह॒ स्थेन्द्र॑स्य॒ बलं॒ स्थेन्द्र॑स्य वी॒र्यं स्थेन्द्र॑स्य नृ॒म्णं स्थ॑ । जि॒ष्णवे॒ योगा॑य क्षत्रयो॒गैर्वो॑ युनज्मि ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 10.5.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति हो तथा तुम ही इंद्र के ऐश्वर्य हो. मैं तुम्हें क्षत्रिय संबंधी योगों से युक्त कर के विजय दिलाने वाले योग की क्षमता वाला बनाता हूं. (२)

EN English Translation

Oh my god! You are indra's energy, strength and semen. You are the power that makes Indra new and you are the richness of Indra. I make you capable of conquering yoga by equipping you with Kshatriya-related yogas. (2)

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