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अथर्ववेद

Kanda 10 • Sukta 5 • Mantra 31

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 10 • सूक्त 5 • मन्त्र 31

10.5.31

Mantra ID: 10.5.31

विष्णोः॒ क्रमो॑ऽसि सपत्न॒हा य॒ज्ञसं॑शितो॒ ब्रह्म॑तेजाः । य॒ज्ञमनु॒ वि क्र॑मे॒ऽहं य॒ज्ञात्तं निर्भ॑जामो॒ यो॒स्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः । स मा जी॑वी॒त्तं प्रा॒णो ज॑हातु ॥ (३१)

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अथर्ववेद मन्त्र 10.5.31 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

तू विष्णु का तेज एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू यज्ञ में स्थित है एवं ब्रह्म का तेज है. मैं ब्रह्म में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा ब्रह्म से उसे हटाता हूं. हम जिस से द्वेष करते हैं अथवा जो हम से द्वेष करता है, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग कर दें. (३१)

EN English Translation

You are the one who destroys Vishnu's glory and enemies. You are situated in the yajna and the glory of Brahman. I display might in Brahman and remove it from Brahman. Let the one we hate or who hates us be destroyed. Give up life from him. (31)

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