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अथर्ववेद

Kanda 11 • Sukta 4 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 11 • सूक्त 4 • मन्त्र 2

11.4.2

Mantra ID: 11.4.2

तत॑श्चैनम॒न्याभ्यां॒ श्रोत्रा॑भ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न् । ब॑धि॒रो भ॑विष्य॒सीत्ये॑नमाह । तं वा॑ अ॒हं ना॒र्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म् । द्यावा॑पृथि॒वीभ्यां॒ श्रोत्रा॑भ्याम् । ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम् । ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः । सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 11.4.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

"हे देवदत्त! इन पूर्ववर्ती अनुष्ठान कर्ता ऋषियों ने जिन कानों की ओर से इस ओदन को खाया था, तुम ने यदि उस से भिन्न ओर से उस को खाया तो तुम बहरे हो जाओगे.'-गुरु शिष्य से इस प्रकार कहे. शिष्य कहे कि मैं ने इस ओदन को न पराङ्मुख हो कर खाया, न सामने हो कर खाया और न आत्माभिमुख हो कर खाया. मैं ने ओदन को द्यावा, पृथ्वी रूप कानों की ओर से खाया है. उन्हीं के द्वारा मैं ने ओदन खाया है और उसे वहां पहुंचा दिया, जहां उसे पहुंचना था. यह ओदन सभी अंगों से युक्त, सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण शरीर के रूप में है. जो इस ओदन को इस रूप में जानता है, वही समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर युक्त होता है. (२)

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