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अथर्ववेद

Kanda 12 • Sukta 1 • Mantra 38

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 12 • सूक्त 1 • मन्त्र 38

12.1.38

Mantra ID: 12.1.38

यस्यां॑ सदोहविर्धा॒ने यूपो॒ यस्यां॑ निमी॒यते॑ । ब्र॒ह्माणो॒ यस्या॒मर्च॑न्त्यृ॒ग्भिः साम्ना॑ यजु॒र्विदः॑ । यु॒ज्यन्ते॒ यस्या॑मृ॒त्विजः॒ सोम॒मिन्द्रा॑य॒ पात॑वे ॥ (३८)

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अथर्ववेद मन्त्र 12.1.38 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिस पृथ्वी पर यज्ञ मंडप की रचना होती है, जिस पर यूप खड़े किए जाते हैं. जिस पृथ्वी पर ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा देव पूजन और इंद्र को सोमपान कराने का कार्य होता है. (३८)

EN English Translation

The earth on which the Yajna Mandap is created, on which the yupes are erected. On the earth on which the mantras of Rigveda, Samaveda and Yajurveda do the work of worshiping God and making Indra drink Sompan. (38)

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