Popular:
अथर्ववेद

Kanda 17 • Sukta 1 • Mantra 24

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 17 • सूक्त 1 • मन्त्र 24

17.1.24

Mantra ID: 17.1.24

उद॑गाद॒यमा॑दि॒त्यो विश्वे॑न॒ तप॑सा स॒ह । स॒पत्ना॒न्मह्यं॑ र॒न्धय॒न्मा चा॒हंद्वि॑ष॒ते र॑धं॒ तवेद्वि॑ष्णो बहु॒धावी॒र्याणि । त्वं नः॑ पृणीहिप॒शुभि॑र्वि॒श्वरू॑पैः सु॒धायां॑ मा धेहि पर॒मे व्योमन् ॥ (२४)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 17.1.24 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

यह सूर्य पूर्ण विश्व को संतप्त करने वाली किरणों के साथ उदय हुए हैं. ये मेरे शत्रुओं को मेरे वश में करते हैं तथा मुझे किसी शत्रु के वशीभूत नहीं बनाते. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ही शक्तियां अनंत हैं. तुम मुझे गाय, भैंस आदि सभी पशुओं से पूर्ण करो और परम व्योम में जो सुधा है, उस में मुझे स्थित करो. (२४)

EN English Translation

These suns have risen with the rays that afflict the whole world. They subdue my enemies and do not subjugate me to any enemy. O broad sun! Your own powers are infinite. You complete me with all the animals like cows, buffaloes, etc. and place me in the sudha that is in the supreme vyom. (24)

卐 HinduText AI