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अथर्ववेद

Kanda 17 • Sukta 1 • Mantra 27

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 17 • सूक्त 1 • मन्त्र 27

17.1.27

Mantra ID: 17.1.27

प्र॒जाप॑ते॒रावृ॑तो॒ ब्रह्म॑णा॒ वर्म॑णा॒हं क॒श्यप॑स्य॒ ज्योति॑षा॒ वर्च॑सा च । ज॒रद॑ष्टिः कृ॒तवी॑र्यो॒ विहा॑याः स॒हस्रा॑युः॒ सुकृ॑तश्चरेयम् ॥ (२७)

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अथर्ववेद मन्त्र 17.1.27 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

वर्षा आदि के द्वारा प्रजाओं का पालन करने से सूर्य प्रजापति हैं. मैं प्रजापति सूर्य के कवच से तथा कश्यप ऋषि की ज्योति और तेज से घिरा हुआ हूं, सुरक्षित हूं. मैं जीर्ण अर्थात्‌ वृद्ध हो कर भी दृढ़ अंगों वाला हूं तथा अनेक प्रकार के भोगों को भोगता हूं. मैं दीर्घ आयु प्राप्त करता हुआ तथा लौकिक और वेदों का कार्य करता हुआ सूर्य देव की कृपा का पात्र रहूं. (२७)

EN English Translation

Surya Prajapati is by following the subjects through rain etc. I am surrounded by the armor of Prajapati Sun and the light and glory of Sage Kashyapa, I am safe. I am old and have strong limbs and enjoy many types of enjoyments. May I be worthy of the grace of the Sun God while attaining a long life and doing the work of cosmic and Vedas. (27)

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