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अथर्ववेद

Kanda 19 • Sukta 45 • Mantra 6

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 19 • सूक्त 45 • मन्त्र 6

19.45.6

Mantra ID: 19.45.6

अ॒ग्निर्मा॒ग्निना॑वतु प्रा॒णाया॑पा॒नायायु॑षे॒ वर्च॑स॒ ओज॑से तेज॑से स्व॒स्तये॑ सुभू॒तये॒ स्वाहा॑ ॥ (६)

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अथर्ववेद मन्त्र 19.45.6 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

ऊपर के भाग में घी से लिए हुए, शहद से युक्त, दूध से संपन्न, सभी देवों से अनुगृहीत होने के कारण हजारों शक्तियों से पूर्ण, इंद्र के कवच से सुरक्षित होने के कारण सौ बलों से संपन्न, मणि धारक पुरुष को अन्न प्रदान करने वाले, सुख देने वाले, सुविधा प्रदान करने वाले, अन्न के दाता तथा दूध आदि देने वाले आस्तृत नाम की इस मणि की सभी देव रक्षा करें. (६)

EN English Translation

In the upper part, taken from ghee, honey, rich in milk, full of thousands of powers due to being accepted by all the gods, being protected by Indra's armor, endowed with a hundred forces, who provide food to the gem-holding man, gives happiness, provides convenience, gives food and milk etc. (6)

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