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19.49.4
सिं॒हस्य॒ रात्र्यु॑श॒ती पीं॒षस्य॑ व्या॒घ्रस्य॑ द्वी॒पिनो॒ वर्च॒ आ द॑दे । अश्व॑स्य ब्र॒ध्नं पुरु॑षस्य मा॒युं पु॒रु रू॒पाणि॑ कृणुषे विभा॒ती ॥ (४)
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अथर्ववेद मन्त्र 19.49.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
इच्छा करती हुई यह रात्रि सिंह, हाथी, गैंडा, बाघ आदि के तेजों का अपहरण करती है. यह अश्च के वेग को तथा पुरुष के शब्द को खींच लेती है. हे रात्रि! तुम दीप्तिमती हो कर नाना प्रकार के रूप धारण करती हो. (४)
EN English Translation
Wishing, this night kidnaps the tejas of lions, elephants, rhinos, tigers, etc. It pulls the velocity of the ashch and the word of the man. O night! You are radiant and take various types of forms. (4)