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अथर्ववेद

Kanda 19 • Sukta 68 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 19 • सूक्त 68 • मन्त्र 1

19.68.1

Mantra ID: 19.68.1

अव्य॑सश्च॒ व्यच॑सश्च॒ बिलं॒ वि ष्या॑मि मा॒यया॑ । ताभ्या॑मु॒द्धृत्य॒ वेद॒मथ॒ कर्मा॑णि कृण्महे ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 19.68.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मैं सभी के शरीरों में व्याप्त व्यान वायु और व्यक्तिगत रूप से व्याप्त प्राण वायु के मूल आधार को कर्म के द्वारा विस्तृत करता हूं. हम उन व्यान और प्राण वायु के द्वारा अक्षरात्मक वेद को परा, पश्यंती और वैखरी वाणियों के क्रम से प्रत्यक्ष कर के यज्ञ कर्म करते हैं. (१)

EN English Translation

I elaborate on the basic basis of vyan vayu and personally pervading prana vayu in everyone's bodies through karma. We perform yajna karma by directing the lettering Vedas in the order of para, pashyanti and vaikhari vaanis through those vyan and prana vayu. (1)

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