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अथर्ववेद

Kanda 2 • Sukta 1 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 2 • सूक्त 1 • मन्त्र 1

2.1.1

Mantra ID: 2.1.1

वे॒नस्तत्प॑श्यत्पर॒मं गुहा॒ यद्यत्र॒ विश्वं॒ भव॒त्येक॑रूपम् । इ॒दं पृश्नि॑रदुह॒ज्जाय॑मानाः स्व॒र्विदो॑ अ॒भ्य॑नूषत॒ व्राः ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 2.1.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

दीप्तिशाली आदित्य ने समस्त प्राणियों के हृदय में सत्य, ज्ञान आदि लक्षणों से युक्त ब्रह्म का साक्षात्कार किया, जिस में समस्त विश्व एकाकार हो जाता है. स्वर्ग और आदित्य ने इस विश्व को व्यक्त किया. उत्पन्न होती हुई तथा अपने उत्पन्न कर्ता को जानती हुई प्रजाएं उस की स्तुति करती हैं. (१)

EN English Translation

The glorious Aditya interviewed Brahman with signs of truth, knowledge, etc. in the hearts of all beings, in which the whole world becomes one. Heaven and Aditya expressed this world. People who are born and know their Creator praise Him. (1)

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