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अथर्ववेद

Kanda 2 • Sukta 30 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 2 • सूक्त 30 • मन्त्र 1

2.30.1

Mantra ID: 2.30.1

यथे॒दं भूम्या॒ अधि॒ तृणं॒ वातो॑ मथा॒यति॑ । ए॒वा म॑थ्नामि ते॒ मनो॒ यथा॒ मां का॒मिन्यसो॒ यथा॒ मन्नाप॑गा॒ असः॑ ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 2.30.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे स्त्री! धरती के ऊपर पड़े हुए तिनके को वायु जिस प्रकार भ्रमित करती है, मैं तेरे मन को उसी प्रकार चंचल बना दूंगा. इस से तू मुझे चाहने वाली बन जाएगी तथा मेरे पास से कहीं अन्यत्र नहीं जा सकेगी. (१)

EN English Translation

Oh woman! Just as the wind confuses the straw lying on the earth, I will make your mind fickle in the same way. With this, you will become a lover of me and you will not be able to go anywhere else near me. (1)

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