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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 31 • Mantra 4

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 31 • मन्त्र 4

20.31.4

Mantra ID: 20.31.4

स्रुवे॑व यस्य॒ हरि॑णी विपे॒ततुः॒ शिप्रे॒ वाजा॑य॒ हरि॑णी॒ दवि॑ध्वतः । प्र यत्कृ॒ते च॑म॒से मर्मृ॑ज॒द्धरी॑ पी॒त्वा मद॑स्य हर्य॒तस्यान्ध॑सः ॥ (४)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.31.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

यज्ञ में जिस प्रकार वे चलते हैं, उसी प्रकार सोमरस का पान करने के लिए इंद्र की हरे रंग की चिबुक अर्थात्‌ ठुङूडी चलती है. जब चमस सोमरस से भर जाता है, तब उसे पीने के लिए इंद्र की ठुडूडी फड़कने लगती है. उस समय इंद्र अपने घोड़ों का परिमार्जन अर्थात्‌ सफाई करते हैं. (४)

EN English Translation

Just as he walks in the yajna, in the same way, Indra's green colored chinbuk i.e. chindi runs to drink someras. When Chamas is filled with somersa, Indra's theududi starts twitching to drink it. At that time Indra cleans his horses. (4)

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