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अथर्ववेद

Kanda 3 • Sukta 1 • Mantra 4

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 3 • सूक्त 1 • मन्त्र 4

3.1.4

Mantra ID: 3.1.4

प्रसू॑त इन्द्र प्र॒वता॒ हरि॑भ्यां॒ प्र ते॒ वज्रः॑ प्रमृ॒णन्ने॑तु॒ शत्रू॑न् । ज॒हि प्र॒तीचो॑ अ॒नूचः॒ परा॑चो॒ विष्व॑क्स॒त्यं कृ॑णुहि चि॒त्तमे॑षाम् ॥ (४)

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अथर्ववेद मन्त्र 3.1.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! हरि नाम के अश्चों से युक्त रथ में बैठ कर तुम समतल मार्ग से अपने वज्र को धारण करते हुए शत्रु सेना की ओर गमन करो. तुम सामने और पीछे से आते हुए तथा युद्ध से मुंह मोड़ कर भागते हुए शत्रुओं का विनाश करो. हमारे विनाश के प्रति दृढ़ निश्चय वाले इन के चित्त को तुम सर्वथा अव्यवस्थित कर दो. (४)

EN English Translation

O Indra! Sitting in a chariot with tears named Hari, you should go towards the enemy army, wearing your thunderbolt through the flat path. Destroy the enemies by coming from the front and behind and running away from the war. Make their minds, who are determined to destroy us, completely disorder. (4)

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