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अथर्ववेद

Kanda 3 • Sukta 21 • Mantra 7

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 3 • सूक्त 21 • मन्त्र 7

3.21.7

Mantra ID: 3.21.7

दिवं॑ पृथि॒वीमन्व॒न्तरि॑क्षं॒ ये वि॒द्युत॑मनुसं॒चर॑न्ति । ये दि॒क्ष्व॑१न्तर्ये वाते॑ अ॒न्तस्तेभ्यो॑ अ॒ग्निभ्यो॑ हु॒तम॑स्त्वे॒तत् ॥ (७)

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अथर्ववेद मन्त्र 3.21.7 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो अग्नि देव आकाश, पृथ्वी और इन के मध्य भाग में व्याप्त हैं, जो बादलों में स्थित बिजली में संचरण करते हैं, जो अग्नि तीनों लोकों में व्याप्त दिशाओं में वर्तमान हैं तथा सारे जगत्‌ के आधार वायु में संचरण करते हैं, उन सभी को मेरी आहुति प्राप्त हो. (७)

EN English Translation

May the agni god who pervades the sky, the earth and the central part of them, who transmits in the electricity located in the clouds, who are present in the directions prevailing in the three worlds and transmit in the air, the base of the whole world, may all of them receive My sacrifice. (7)

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