Popular:
अथर्ववेद

Kanda 3 • Sukta 22 • Mantra 4

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 3 • सूक्त 22 • मन्त्र 4

3.22.4

Mantra ID: 3.22.4

यत्ते॒ वर्चो॑ जातवेदो बृ॒हद्भव॒त्याहु॑तेः । याव॒त्सूर्य॑स्य॒ वर्च॑ आसु॒रस्य॑ च ह॒स्तिनः॑ । ताव॑न्मे अ॒श्विना॒ वर्च॒ आ ध॑त्तां॒ पुष्क॑रस्रजा ॥ (४)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 3.22.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे जन्म लेने वाले प्राणियों के ज्ञाता तथा आहुतियों द्वारा हवन किए जाते हुए अग्नि देव! तुम में जितना तेज है, सूर्य में जितना तेज है तथा असुरों के हाथों में जितना तेज है, उतना ही तेज कमल की माला से सुशोभित अश्विनीकुमार मुझ में धारण करें. (४)

EN English Translation

O God of agni performed havan by the knowers and ahutis of beings born! The brighter you are, the brighter you are in the sun and the faster it is in the hands of asuras, the more sharp Ashwinikumar, adorned with a lotus garland, should wear in me. (4)

卐 HinduText AI