Popular:
अथर्ववेद

Kanda 3 • Sukta 25 • Mantra 4

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 3 • सूक्त 25 • मन्त्र 4

3.25.4

Mantra ID: 3.25.4

शु॒चा वि॒द्धा व्यो॑षया॒ शुष्का॑स्या॒भि स॑र्प मा । मृ॒दुर्निम॑न्युः॒ केव॑ली प्रियवा॒दिन्यनु॑व्रता ॥ (४)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 3.25.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

दाह करने वाले तथा शोकात्मक बाण से घायल होने के कारण तेरा कंठ सूख जाए और उस कंठ के कारण अपना अभिप्राय प्रकट करने में असमर्थ हो कर तू मेरे समीप आ. तू मृदुभाषिणी, एकमात्र मुझ से रक्षा पाने वाली तथा मेरे अनुकूल बोलने वाली बन और मेरे अनुकूल आचरण कर. (४)

EN English Translation

Your throat may dry up because of the burning and the wounding arrow, and because of that throat, unable to express your intention, come close to me. You become soft-spoken, the only protector from me and speak in favor of me and behave in favor of me. (4)

卐 HinduText AI