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अथर्ववेद

Kanda 4 • Sukta 26 • Mantra 5

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 4 • सूक्त 26 • मन्त्र 5

4.26.5

Mantra ID: 4.26.5

ये उ॒स्रिया॑ बिभृ॒थो ये वन॒स्पती॒न्ययो॑र्वां॒ विश्वा॒ भुव॑नान्य॒न्तः । द्यावा॑पृथिवी॒ भव॑तं मे स्यो॒ने ते नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ (५)

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अथर्ववेद मन्त्र 4.26.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो द्यावा पृथ्वी सभी गायों को धारण करते हैं, जो सभी वृक्षों को धारण करते हैं तथा जिन दोनों के मध्य समस्त भवन हैं, वे द्यावा पृथ्वी, मेरे लिए सुख का कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (५)

EN English Translation

May the dyava earth, all the cows, those who hold all the trees and those who have all the buildings between them, may the dyava earth, cause happiness for me and redeem me from sin. (5)

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