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अथर्ववेद

Kanda 4 • Sukta 8 • Mantra 5

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 4 • सूक्त 8 • मन्त्र 5

4.8.5

Mantra ID: 4.8.5

या आपो॑ दि॒व्याः पय॑सा॒ मद॑न्त्य॒न्तरि॑क्ष उ॒त वा॑ पृथि॒व्याम् । तासां॑ त्वा॒ सर्वा॑साम॒पाम॒भि षि॑ञ्चामि॒ वर्च॑सा ॥ (५)

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अथर्ववेद मन्त्र 4.8.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे राजा! आकाश से बरसने वाले जो जल अपने रस से, प्राणियों को तृप्त करते हैं, अंतरिक्ष और पृथ्वी पर जो जल स्थित हैं, मैं तीनों लोकों में स्थित इन जलों से तुम्हारा अभिषेक करता हूं. (५)

EN English Translation

O king! The water that rains from the sky, with its juice, satisfies the creatures, the water that is located in space and on earth, I anoint you with these waters located in the three worlds. (5)

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