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अथर्ववेद

Kanda 5 • Sukta 18 • Mantra 5

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 5 • सूक्त 18 • मन्त्र 5

5.18.5

Mantra ID: 5.18.5

य ए॑नं॒ हन्ति॑ मृ॒दुं मन्य॑मानो देवपी॒युर्धन॑कामो॒ न चि॒त्तात् । सं तस्येन्द्रो॒ हृद॑ये॒ऽग्निमि॑न्ध उ॒भे ए॑नं द्विष्टो॒ नभ॑सी॒ चर॑न्तम् ॥ (५)

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अथर्ववेद मन्त्र 5.18.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

ब्राह्मण को मृदु समझने वाला जो अज्ञानी उसे नष्ट करना चाहता है, वह देव हिंसक है. इंद्र उस पापी के हृदय में अग्नि प्रज्वलित कर देते हैं और आकाश तथा पृथ्वी दोनों उस के प्रति वैर भाव रखते हैं. (५)

EN English Translation

The ignorant who thinks the Brahmin is soft, wants to destroy him, that God is violent. Indra ignites agni in the heart of that sinner and both the sky and the earth have an animosity towards him. (5)

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