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अथर्ववेद

Kanda 5 • Sukta 22 • Mantra 14

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 5 • सूक्त 22 • मन्त्र 14

5.22.14

Mantra ID: 5.22.14

ग॒न्धारि॑भ्यो॒ मूज॑व॒द्भ्योऽङ्गे॑भ्यो म॒गधे॑भ्यः । प्रै॒ष्यन् जन॑मिव शेव॒धिं त॒क्मानं॒ परि॑ दद्मसि ॥ (१४)

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अथर्ववेद मन्त्र 5.22.14 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हम मूंज वाले स्थान से, अंग देश से, मध्य देश से और गांधार देश से कष्ट वाले रोग ज्वर को भगाते हुए सुखी बनते है. (१४)

EN English Translation

We become happy by removing the painful disease fever from the place of moonj, from the country of the organ, from the middle country and from the country of Gandhara. (14)

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