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अथर्ववेद

Kanda 5 • Sukta 23 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 5 • सूक्त 23 • मन्त्र 1

5.23.1

Mantra ID: 5.23.1

ओते॑ मे॒ द्यावा॑पृथि॒वी ओता॑ दे॒वी सर॑स्वती । ओतौ॑ म॒ इन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॒ क्रिमिं॑ जम्भयता॒मिति॑ ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 5.23.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

द्यावा पृथ्वी, सरस्वती देवी, इंद्र और अग्नि मुझ में ओतप्रोत हैं. वे कृमियों का विनाश करें. (१)

EN English Translation

Dyava Prithvi, Saraswati Devi, Indra and Agni are imbued in me. Let them destroy the worms. (1)

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