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अथर्ववेद

Kanda 5 • Sukta 28 • Mantra 4

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 5 • सूक्त 28 • मन्त्र 4

5.28.4

Mantra ID: 5.28.4

इ॒ममा॑दित्या॒ वसु॑ना॒ समु॑क्षते॒मम॑ग्ने वर्धय वावृधा॒नः । इ॒ममि॑न्द्र॒ सं सृ॑ज वी॒र्ये॑णा॒स्मिन्त्रि॒वृच्छ्र॑यतां पोषयि॒ष्णु ॥ (४)

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अथर्ववेद मन्त्र 5.28.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

आदित्य इस बालक को धन से पूर्ण करें. हे अग्नि, तुम स्वयं बढ़ते हुए इस बालक की भी वृद्धि करो. हे इंद्र! तुम इसे वीर्य युक्त करो. पोषण करने वाला त्रिवृत्त इस का आश्रित हो. (४)

EN English Translation

Aditya should complete this child with money. O Agni, grow yourself and increase this child too. O Indra! You make it-containing. The nourishing trinity should be dependent on it. (4)

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