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अथर्ववेद

Kanda 6 • Sukta 113 • Mantra 3

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 6 • सूक्त 113 • मन्त्र 3

6.113.3

Mantra ID: 6.113.3

द्वा॑दश॒धा निहि॑तं त्रि॒तस्याप॑मृष्टं मनुष्यैन॒सानि॑ । ततो॒ यदि॑ त्वा॒ ग्राहि॑रान॒शे तां ते॑ दे॒वा ब्रह्म॑णा नाशयन्तु ॥ (३)

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अथर्ववेद मन्त्र 6.113.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

त्रित के पाप को बारह स्थानों पर रखा गया. पहले मनुष्य में, उस के बाद तीन आप्तियों में, इस के पश्चात सूर्योदय की आठ दिशाओं में-इस प्रकार वह पाप बारह स्थानों पर रखा गया है. इस कारण यदि ग्रहणशील पाप देवता ग्राही ने तुम्हें प्राप्त किया है तो उसे देवगण मंत्र के द्वारा नष्ट कर दें. (३)

EN English Translation

Trit's sin was kept in twelve places. In the first man, then in the three disasters, after this in the eight directions of sunrise- thus that sin is placed in twelve places. For this reason, if the receptive sin god has received you, then destroy it with the Devgan Mantra. (3)

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