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6.23.1
स॒स्रुषी॒स्तद॒पसो॒ दिवा॒ नक्तं॑ च स॒स्रुषीः॑ । वरे॑ण्यक्रतुर॒हम॒पो दे॒वीरुप॑ ह्वये ॥ (१)
HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें
अथर्ववेद मन्त्र 6.23.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
उत्तम कर्म करने वाला मैं सभी प्राणियों के जीवन का रूप प्राप्त करने वाले, जगत् के रक्षक एवं सदैव बहने वाले जलों को अपने समीप बुलाता हूं. (१)
EN English Translation
I call the one who takes the form of life of all beings, the protector of the world and the waters that always flow close to me. (1)