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अथर्ववेद

Kanda 6 • Sukta 49 • Mantra 3

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 6 • सूक्त 49 • मन्त्र 3

6.49.3

Mantra ID: 6.49.3

सु॑प॒र्णा वाच॑मक्र॒तोप॒ द्यव्या॑ख॒रे कृष्णा॑ इषि॒रा अ॑नर्तिषुः । नि यन्नि॒यन्ति॒ उप॑रस्य॒ निष्कृ॑तिं पु॒रू रेतो॑ दधिरे सूर्यश्रितः ॥ (३)

ॐ

शास्त्र जिज्ञासा: इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 6.49.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

॥ वैदिक संदर्भ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि! तुम्हारी ज्वालाएं बाज पक्षी के समान शीघ्र व्यापक होने वाली हैं. काला हरिण जिस प्रकार अपने निवास स्थान में गति करता है, उसी प्रकार तुम्हारी ज्वालाएं समीप आ कर नृत्य करती है. धुआं उत्पन्न करने के कारण तुम्हारी ज्वालाएं मेघ का निर्माण करती हैं. हे अग्नि! तुम्हारी दीप्तियां सूर्य मंडल को पा कर सभी प्राणियों के जीवन के आधार जल को उत्पन्न करती हैं. (३)

EN English Translation

O agni! Your flames are going to be as widespread as a hawk bird soon. Just as the black deer moves in its habitat, your flames come close and dance. Due to the production of smoke, your flames form clouds. O agni! Your radiances reach the solar system and produce water, the basis of the life of all beings. (3)

शास्त्र जिज्ञासा
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