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अथर्ववेद

Kanda 6 • Sukta 5 • Mantra 3

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 6 • सूक्त 5 • मन्त्र 3

6.5.3

Mantra ID: 6.5.3

यस्य॑ कृ॒ण्मो ह॒विर्गृ॒हे तम॑ग्ने वर्धया॒ त्वम् । तस्मै॒ सोमो॒ अधि॑ ब्रवद॒यं च॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑ ॥ (३)

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अथर्ववेद मन्त्र 6.5.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि देव! हम जिस यजमान के घर में यज्ञ कर रहे हैं, उस यजमान को तुम समृद्ध बनाओ. सोम देव एवं ब्रह्मणस्पति देव इसे अपना कहें. (३)

EN English Translation

O God of Agni! Make the host in whose house we are performing the yajna prosperous. Som Dev and Brahmanspati Dev call it their own. (3)

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