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अथर्ववेद

Kanda 7 • Sukta 15 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 7 • सूक्त 15 • मन्त्र 2

7.15.2

Mantra ID: 7.15.2

उ॒र्ध्वा यस्या॒मति॒र्भा अदि॑द्युत॒त्सवी॑मनि । हिर॑ण्यपाणिरमिमीत सु॒क्रतुः॑ कृ॒पात्स्वः ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 7.15.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिन सविता देव की व्याप्त करने वाली दीप्ति उत्कृष्ट है तथा सारे जगत्‌ को प्रकाशित करती है उन की आज्ञा होने पर शोभन कर्म वाले ब्रह्मा हाथ में सोना ले कर कल्पना के द्वारा सुख देने वाले सोम का निर्माण करते हैं. (२)

EN English Translation

On the orders of Savita Dev, whose pervading glow is excellent and illuminates the whole world, Brahma, who is doing shobhan karma, takes gold in his hand and creates soma, which gives happiness through imagination. (2)

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