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अथर्ववेद

Kanda 7 • Sukta 28 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 7 • सूक्त 28 • मन्त्र 1

7.28.1

Mantra ID: 7.28.1

इडै॒वास्माँ अनु॑ वस्तां व्र॒तेन॒ यस्याः॑ प॒दे पु॒नते॑ देव॒यन्तः॑ । घृ॒तप॑दी॒ शक्व॑री॒ सोम॑पृ॒ष्ठोप॑ य॒ज्ञम॑स्थित वैश्वदे॒वी ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 7.28.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

गहन रूपा इडा ही हमारे द्वारा किए जाते हुए यह कर्मो को फल देने वाला बनाएं. उस इडा के चरणों में देवों की कामना करने वाले यजमान अपनेआप को पवित्र करते हैं. हम जहांजहां चरण रखें वहांवहां घृत टपकाने वाली, फल देने में समर्थ एवं पीठ पर सोम लिए हुए इडा नाम की बहन हमारे यज्ञ को विस्तृत करें. (१)

EN English Translation

Make these deeds worth bearing fruit while doing deep rupa ida. At the feet of that Ida, the hosts who wish for the gods sanctify themselves. Wherever we step, let a sister named Ida, who is able to give fruits and has soma on her back, expand our yajna. (1)

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