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अथर्ववेद

Kanda 7 • Sukta 40 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 7 • सूक्त 40 • मन्त्र 1

7.40.1

Mantra ID: 7.40.1

दि॒व्यं सु॑प॒र्णं प॑य॒सं बृ॒हन्त॑म॒पां गर्भं॑ वृष॒भमोष॑धीनाम् । अ॑भीप॒तो वृ॒ष्ट्या त॒र्पय॑न्त॒मा नो॑ गो॒ष्ठे र॑यि॒ष्ठां स्था॑पयाति ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 7.40.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! हमारी गोशाला में दिव्य, शोभन गति वाले, जल से पूर्ण, महान जलों के मध्य रहने वाले, जड़ीबूटियों की वृद्धि के लिए वर्षा करने वाले, सभी ओर से जलों से संगत एवं सारे संसार को वर्षा से तृप्त करने वाले सारस्वत नामक देव को स्थापित करो. वे सदा धन वाले प्रदेश में ठहरते हैं. (१)

EN English Translation

O Indra! Establish in our gaushala a god called Saraswat, who is divine, full of water, who lives among great waters, who showers for the growth of herbs, is compatible with water from all sides and satisfies the whole world with rain. They always stay in a region of wealth. (1)

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