Popular:
अथर्ववेद

Kanda 7 • Sukta 45 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 7 • सूक्त 45 • मन्त्र 1

7.45.1

Mantra ID: 7.45.1

उ॒भा जि॑ग्यथु॒र्न परा॑ जयेथे॒ न परा॑ जिग्ये कत॒रश्च॒नैन॑योः । इन्द्र॑श्च विष्णो॒ यदप॑स्पृधेथां त्रे॒धा स॒हस्रं॒ वि तदै॑रयेथाम् ॥ (१)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 7.45.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र और विष्णु! तुम दोनों सर्वदा विजयी बनो और किसी से कभी पराजित न होओ. इन दोनों में से एक भी दूसरे से पराजित नहीं होता. हे इंद्र और विष्णु! तुम दो असुरों के साथ जिस वस्तु की स्पर्धा करते हो, वह वस्तु लोक, वेद और वाणी के रूप में स्थित हो कर हजारों से भी बढ़कर हो. (१)

EN English Translation

O Indra and Vishnu! May both of you always be victorious and never defeated by anyone. Neither of these two is defeated by the other. O Indra and Vishnu! The object that you compete with two asuras is located in the form of Lok, Veda and Vani and is more than thousands. (1)

卐 HinduText AI