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अथर्ववेद

Kanda 7 • Sukta 47 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 7 • सूक्त 47 • मन्त्र 1

7.47.1

Mantra ID: 7.47.1

अ॒ग्नेरि॑वास्य॒ दह॑तो दा॒वस्य॒ दह॑तः॒ पृथ॑क् । ए॒तामे॒तस्ये॒र्ष्यामु॒द्नाग्निमि॑व शमय ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 7.47.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिस प्रकार अग्नि वस्तुओं को जलाती है, उसी प्रकार क्रोध के कारण मेरे कार्य बिगाड़ने वाले तथा दावाग्नि के जलाने के समान क्रोध करते हुए सामने वाले पुरुष को मेरे विषय में प्रयोग की जाती हुई ईर्ष्या को इस प्रकार शांत करो, जिस प्रकार शीतल जल डालने से अग्नि शांत कर दी जाती है. (१)

EN English Translation

Just as agni burns things, in the same way, the one who spoils my work due to anger and while angering like burning the agni, calm the jealousy used in the opposite man about me in such a way that the agni is calmed by pouring cold water. (1)

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