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अथर्ववेद

Kanda 8 • Sukta 3 • Mantra 5

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 8 • सूक्त 3 • मन्त्र 5

8.3.5

Mantra ID: 8.3.5

यत्रे॒दानीं॒ पश्य॑सि जातवेद॒स्तिष्ठ॑न्तमग्न उ॒त वा॒ चर॑न्तम् । उ॒तान्तरि॑क्षे॒ पत॑न्तं यातु॒धानं॒ तमस्ता॑ विध्य॒ शर्वा॒ शिशा॑नः ॥ (५)

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अथर्ववेद मन्त्र 8.3.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे जातवेद अग्नि देव! तुम कहीं बैठे हुए और कहीं चलतेफिरते हुए राक्षसों को देखते हो. वे इस देश में हमारे प्रति उपद्रव करते है. आकाश में भी जाते हुए उस राक्षस को खींच लेने वाले तुम तीक्ष्ण हो कर अपनी ज्वालाओं से मारो. (५)

EN English Translation

O Jataveda Agni Dev! You see demons sitting somewhere and walking somewhere. They create nuisance towards us in this country. Even while going to the sky, you who pull that monster, be sharp and kill it with your flames. (5)

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