Popular:
अथर्ववेद

Kanda 8 • Sukta 5 • Mantra 16

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 8 • सूक्त 5 • मन्त्र 16

8.5.16

Mantra ID: 8.5.16

अ॒यमिद्वै प्र॑तीव॒र्त ओज॑स्वान्संज॒यो म॒णिः । प्र॒जां धनं॑ च रक्षतु परि॒पाणः॑ सुम॒ङ्गलः॑ ॥ (१६)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 8.5.16 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

तिलक वृक्ष से निर्मित यह मणि निश्चय ही पाप राक्षसी कृत्या को लौटाने में समर्थ, अतिशय ओजस्वी एवं विजय प्राप्त करने वाली है. यह मणि पुत्र, पौत्र आदि की रक्षा करे एवं मेरी भी सभी प्रकार रक्षा करे. (१६)

EN English Translation

This gem made of tilak tree is definitely capable of returning the sin demonic act, very energetic and conquering. May this gem protect the son, grandson etc. and protect me in all ways. (16)

卐 HinduText AI