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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 144 • Mantra / Rik 7

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 144 • ऋचा / मन्त्र 7

1.144.7

Mantra ID: 1.144.7

अग्ने॑ जु॒षस्व॒ प्रति॑ हर्य॒ तद्वचो॒ मन्द्र॒ स्वधा॑व॒ ऋत॑जात॒ सुक्र॑तो । यो वि॒श्वतः॑ प्र॒त्यङ्ङसि॑ दर्श॒तो र॒ण्वः संदृ॑ष्टौ पितु॒माँ इ॑व॒ क्षयः॑ ॥ (७)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.144.7 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि! तुम हव्य का सेवन करो एवं प्रिय स्तोत्र सुनने की इच्छा करो. हे प्रसन्नताकारक, अन्नयुक्त, यज्ञ के निमित्त-उत्पन्न तथा शोभन-बुद्धि अग्नि! तुम समस्त विश्व के अनुकूल, सबके दर्शनीय, रमणशील एवं प्रभूत-अन्न के स्वामी के समान सबके आश्रयदाता हो. (७)

EN English Translation

O fire! You should consume the greeting and wish to listen to the beloved hymns. O pleasing, the food-rich, the fire of yajna-generated and adorned-wise fire! You are the protector of all the world, friendly to all, as the lord of all the visible, delightful and abundant food. (7)

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