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1.159.4
ते मा॒यिनो॑ ममिरे सु॒प्रचे॑तसो जा॒मी सयो॑नी मिथु॒ना समो॑कसा । नव्यं॑नव्यं॒ तन्तु॒मा त॑न्वते दि॒वि स॑मु॒द्रे अ॒न्तः क॒वयः॑ सुदी॒तयः॑ ॥ (४)
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ऋग्वेद मन्त्र 1.159.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
द्यावापृथ्वी सदा एक स्थान पर युगलरूप में रहने वाली ऐसी प्रजायुक्त एवं चेतनासंपन्न सगी बहिनें हैं, जिन्हें किरणें अलग-अलग करती हैं. अपने व्यापार को जानने वाली प्रकाशयुक्त रशमियां चमकते हुए आकाश में विस्तृत होती हैं. (४)
EN English Translation
Dyavapathavi is always a peoplely and conscious sister living in a couple of places, whom the rays separate. The light rushes that know your trade are spread out in the shining sky. (4)