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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 183 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 183 • ऋचा / मन्त्र 2

1.183.2

Mantra ID: 1.183.2

सु॒वृद्रथो॑ वर्तते॒ यन्न॒भि क्षां यत्तिष्ठ॑थः॒ क्रतु॑म॒न्तानु॑ पृ॒क्षे । वपु॑र्वपु॒ष्या स॑चतामि॒यं गीर्दि॒वो दु॑हि॒त्रोषसा॑ सचेथे ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.183.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अश्विनीकुमारो! तुम यज्ञ में हवि प्राप्त करने के निमित्त यज्ञ की ओर जिस रथ पर सवार होते हो, उसके पहिए सरलता से घूमते चलते हैं. तुम्हारे शरीर का हित करने वाली हमारी स्तुति तुम्हें प्राप्त हो एवं तुम आकाश की पुत्री उषा के साथ मिलन करो. (२)

EN English Translation

O Ashwinikumaro! The wheels of the chariot on which you ride towards the yajna for the sake of attaining havan in the yajna move smoothly. May you receive our praise that is good to your body and you should meet Usha, the daughter of the sky. (2)

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