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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 71 • Mantra / Rik 3

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 71 • ऋचा / मन्त्र 3

1.71.3

Mantra ID: 1.71.3

दध॑न्नृ॒तं ध॒नय॑न्नस्य धी॒तिमादिद॒र्यो दि॑धि॒ष्वो॒३॒॑ विभृ॑त्राः । अतृ॑ष्यन्तीर॒पसो॑ य॒न्त्यच्छा॑ दे॒वाञ्जन्म॒ प्रय॑सा व॒र्धय॑न्तीः ॥ (३)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.71.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिस प्रकार लोग धन धारण करते हैं, उसी प्रकार अंगिरावंशी ऋषियों ने यज्ञ की अग्नि को धारण किया था. जो यजमान धन के स्वामी हैं जो अन्य विषयों की तृष्णा से रहित होकर अग्नि को धारण करते हुए यज्ञकर्म में संलग्न रहते हैं, वे हविरूप अन्न के द्वारा देवों और मानवों की वृद्धि करते हुए अग्नि के सम्मुख जाते हैं. (३)

EN English Translation

Just as people wear wealth, the Angiravanshi sages wore the agni of yajna. Those who are the masters of wealth, who are free from the thirst of other subjects and engage in yajnakarma while wearing agni, they go in front of agni, increasing gods and human beings through havirupa food. (3)

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