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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 12 • Mantra / Rik 8

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 12 • ऋचा / मन्त्र 8

10.12.8

Mantra ID: 10.12.8

यस्मि॑न्दे॒वा मन्म॑नि सं॒चर॑न्त्यपी॒च्ये॒३॒॑ न व॒यम॑स्य विद्म । मि॒त्रो नो॒ अत्रादि॑ति॒रना॑गान्सवि॒ता दे॒वो वरु॑णाय वोचत् ॥ (८)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.12.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

ज्ञानरूपी अग्नि के यज्ञ में उपस्थित रहने पर देवगण अपने-अपने अधिकार में लग जाते हैं. हम अग्नि के छिपे हुए रूप को नहीं जानते. इस यज्ञ में मित्र, अदिति एवं सूर्य पापनाशक अग्नि के सामने हमको पापरहित बतावें. (८)

EN English Translation

When present in the yagna of the agni of knowledge, the devas get into their own right. We don't know the hidden form of agni. In this yajna, friends, Aditi and Surya should tell us without sin in front of the sinless agni. (8)

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