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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 120 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 120 • ऋचा / मन्त्र 2

10.120.2

Mantra ID: 10.120.2

वा॒वृ॒धा॒नः शव॑सा॒ भूर्यो॑जाः॒ शत्रु॑र्दा॒साय॑ भि॒यसं॑ दधाति । अव्य॑नच्च व्य॒नच्च॒ सस्नि॒ सं ते॑ नवन्त॒ प्रभृ॑ता॒ मदे॑षु ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.120.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

बल से बढ़ते हुए, अधिक शक्तिशाली एवं शन्रुहंता इंद्र दासों के मन में अधिक भय उत्पन्न करते हैं. प्राणयुक्त एवं प्राणहीन पदार्थ इंद्र के द्वारा संशोधित होते हैं. हे इंद्र! तुम्हारी प्रसन्नता उत्पन्न होने पर सभी पोषित प्राणी स्तुति हेतु एकत्र होते हैं. (२)

EN English Translation

Growing by force, the more powerful and the shanruhanta creates more fear in the minds of indra dasas. The living and lifeless substances are modified by Indra. O Indra! When your happiness arises, all the nourished beings gather together for praise. (2)

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