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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 122 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 122 • ऋचा / मन्त्र 5

10.122.5

Mantra ID: 10.122.5

त्वं दू॒तः प्र॑थ॒मो वरे॑ण्यः॒ स हू॒यमा॑नो अ॒मृता॑य मत्स्व । त्वां म॑र्जयन्म॒रुतो॑ दा॒शुषो॑ गृ॒हे त्वां स्तोमे॑भि॒र्भृग॑वो॒ वि रु॑रुचुः ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.122.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि! तुम दूत, सर्वश्रेष्ठ एवं वरण करने योग्य हो. तुम बुलाए जाने पर अमरता देने के लिए प्रसन्न बनो. दाता के घर में मरुदगण तुम्हें सुशोभित करते हैं एवं भृगुवंशी ऋषि स्तोत्रं द्वारा तुम्हें दीप्तिशाली बनाते हैं. (५)

EN English Translation

O agni! You are the messenger, the best and the chooser. Be happy to give immortality when you are called. In the donor's house, the deserts adorn you and the sages of Bhriguvanshi make you radiant through the hymns. (5)

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