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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 129 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 129 • ऋचा / मन्त्र 5

10.129.5

Mantra ID: 10.129.5

ति॒र॒श्चीनो॒ वित॑तो र॒श्मिरे॑षाम॒धः स्वि॑दा॒सी३दु॒परि॑ स्विदासी३त् । रे॒तो॒धा आ॑सन्महि॒मान॑ आसन्स्व॒धा अ॒वस्ता॒त्प्रय॑तिः प॒रस्ता॑त् ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.129.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

आकाश आदि की सृष्टि करने वाले परमात्मा के तेज की किरणें क्या तिरछी थीं, नीचे की ओर थीं अथवा ऊपर की ओर थीं? बीजरूप कर्म को धारण करने वाले जीव थे एवं महान्‌ आकाश आदि भोग्य थे. उस समय अन्न निकृष्ट एवं भोक्ता उत्कृष्ट था. (५)

EN English Translation

Were the rays of the glory of the Divine, which created the sky, etc., slanted, downwards or upwards? The beings possessing seeds of karma and the great sky etc. were enjoyable. At that time the food was abject and the beings were excellent. (5)

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