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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 22 • Mantra / Rik 3

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 22 • ऋचा / मन्त्र 3

10.22.3

Mantra ID: 10.22.3

म॒हो यस्पतिः॒ शव॑सो॒ असा॒म्या म॒हो नृ॒म्णस्य॑ तूतु॒जिः । भ॒र्ता वज्र॑स्य धृ॒ष्णोः पि॒ता पु॒त्रमि॑व प्रि॒यम् ॥ (३)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.22.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

शक्ति के स्वामी, महान्‌, अनंत गुणयुक्त व स्तोताओं को महान्‌ धन देने वाले इंद्र शत्रुपराभवकारी वज्र धारण करते हैं. पिता जिस प्रकार पुत्र की अभिलषित वस्तु की रक्षा करता है, उसी प्रकार इंद्र हमारी मनचाही वस्तुओं की रक्षा करें. (३)

EN English Translation

Indra, the master of power, the great, the infinite virtuous and the great one to the stoetas, holds the enemy's victorious vajra. Just as the Father protects the Son's desired object, so may Indra protect the things we want. (3)

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