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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 27 • Mantra / Rik 11

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 27 • ऋचा / मन्त्र 11

10.27.11

Mantra ID: 10.27.11

यस्या॑न॒क्षा दु॑हि॒ता जात्वास॒ कस्तां वि॒द्वाँ अ॒भि म॑न्याते अ॒न्धाम् । क॒त॒रो मे॒निं प्रति॒ तं मु॑चाते॒ य ईं॒ वहा॑ते॒ य ईं॑ वा वरे॒यात् ॥ (११)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.27.11 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

“मुझ इंद्र से उत्पन्न दर्शनहीना कन्या प्रकृति को मुझ में लीन जानते हुए कौन आश्रय देगा? वृत्र आदि शत्रुओं पर वज्र कौन सा देव फेंकता है? इस शत्रु को मेरे अतिरिक्त न कोई वहन कर सकता है और न वरण कर सकता है.” (११)

EN English Translation

"Who will shelter the visionless Virgo nature born of Indra in me, knowing it absorbed in me? Which god throws thunderbolt at enemies like Vritra etc. No one can afford or choose this enemy other than me." (11)

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