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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 38 • Mantra / Rik 4

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 38 • ऋचा / मन्त्र 4

10.38.4

Mantra ID: 10.38.4

यो द॒भ्रेभि॒र्हव्यो॒ यश्च॒ भूरि॑भि॒र्यो अ॒भीके॑ वरिवो॒विन्नृ॒षाह्ये॑ । तं वि॑खा॒दे सस्नि॑म॒द्य श्रु॒तं नर॑म॒र्वाञ्च॒मिन्द्र॒मव॑से करामहे ॥ (४)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.38.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो इंद्र मानव संहारक युद्ध में धन प्राप्त करते हैं, वे चाहे थोड़े मनुष्यों द्वारा पुकारे जावें अथवा बहुतों द्वारा उन पर शुद्ध, सर्वत्र प्रसिद्ध एवं यज्ञ के नेता इंद्र को आज हम अपने अनुकूल बनाते हैं. (४)

EN English Translation

The Indras who receive wealth in the human destructive war, whether they are called by a few human beings or by many, pure on them, the all-famous and the leader of the yagna, indra, is today friendly to us. (4)

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