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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 49 • Mantra / Rik 4

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 49 • ऋचा / मन्त्र 4

10.49.4

Mantra ID: 10.49.4

अ॒हं पि॒तेव॑ वेत॒सूँर॒भिष्ट॑ये॒ तुग्रं॒ कुत्सा॑य॒ स्मदि॑भं च रन्धयम् । अ॒हं भु॑वं॒ यज॑मानस्य रा॒जनि॒ प्र यद्भरे॒ तुज॑ये॒ न प्रि॒याधृषे॑ ॥ (४)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.49.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मैंने अभिलाषा करने वाले कुत्स ऋषि के अधिकार में वेतसु नामक देश इस प्रकार दे दिया था, जिस प्रकार पिता पुत्र को अपनी संपत्ति देता है. मैंने तुग्र और स्वदिभ नामक व्यक्तियों को भी कुत्स के अधिकार में दे दिया. मैं यजमान को राजा बनाता हूं. जिस प्रकार पिता पुत्र को देता है, उसी प्रकार मैं यजमान को प्रिय वस्तुएं देता हूं. (४)

EN English Translation

I had given the land called Vetsu to the conqueror of the thirsty Qutsa, in the same way that the Father gives his property to the Son. I also gave people named Tughar and Swadibh under the possession of the Dogs. I make the host king. Just as the Father gives to the Son, so I give beloved things to the Host. (4)

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