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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 49 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 49 • ऋचा / मन्त्र 5

10.49.5

Mantra ID: 10.49.5

अ॒हं र॑न्धयं॒ मृग॑यं श्रु॒तर्व॑णे॒ यन्माजि॑हीत व॒युना॑ च॒नानु॒षक् । अ॒हं वे॒शं न॒म्रमा॒यवे॑ऽकरम॒हं सव्या॑य॒ पड्गृ॑भिमरन्धयम् ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.49.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जब श्रुतर्वा ऋषि मेरे समीप आए और उन्होंने मेरी स्तुति की, तब मैंने उनके कल्याण के लिए रांथय नामक असुर को वश में किया. मैंने वेश असुर को नम्र ऋषि तथा षड्गृभि असुर को सव्य ऋषि के कल्याण के लिए वश में किया. (५)

EN English Translation

When sage Shruterva came near to me and praised me, I subdued the asura named Ranthaya for his welfare. I subdued the disguise asura as a humble sage and the shadgribhi asura for the welfare of the sage Savya. (5)

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