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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 87 • Mantra / Rik 15

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 87 • ऋचा / मन्त्र 15

10.87.15

Mantra ID: 10.87.15

परा॒द्य दे॒वा वृ॑जि॒नं श‍ृ॑णन्तु प्र॒त्यगे॑नं श॒पथा॑ यन्तु तृ॒ष्टाः । वा॒चास्ते॑नं॒ शर॑व ऋच्छन्तु॒ मर्म॒न्विश्व॑स्यैतु॒ प्रसि॑तिं यातु॒धानः॑ ॥ (१५)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.87.15 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

आज महान्‌ देव पापी राक्षस को समाप्त करें. हमारी बुरी उक्तियां इस राक्षस को लगें. हमारे बाण इस असत्यवादी राक्षस को लगें. राक्षस व्याप्त अग्ने के जाल में फंसे. (१५)

EN English Translation

End the great god sinner monster today. Let our bad quotes seem to this monster. Let our arrows look to this untrustworthy monster. Trapped in the trap of the monster pervading agne. (15)

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