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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 91 • Mantra / Rik 1

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 91 • ऋचा / मन्त्र 1

10.91.1

Mantra ID: 10.91.1

सं जा॑गृ॒वद्भि॒र्जर॑माण इध्यते॒ दमे॒ दमू॑ना इ॒षय॑न्नि॒ळस्प॒दे । विश्व॑स्य॒ होता॑ ह॒विषो॒ वरे॑ण्यो वि॒भुर्वि॒भावा॑ सु॒षखा॑ सखीय॒ते ॥ (१)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.91.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे जागरणशील स्तोताओं द्वारा प्रशंसित अग्नि! तुम प्रज्वलित होते हो. दानशील अग्नि उत्तर वेदी पर स्थित होकर अन्न की अभिलाषा से समस्त हवि के होता बनते हैं. वरण करने योग्य, व्यापक, दीप्तिशाली एवं शोभन अग्नि मित्र के समान व्यवहार करते हैं. (१)

EN English Translation

O agni admired by awakening hymns! You ignite. The demonic agni is located on the north altar and is made of all the havi from the desire for food. Selectable, broad, radiant and behave like a friend of shobhan agni. (1)

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