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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 94 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 94 • ऋचा / मन्त्र 5

10.94.5

Mantra ID: 10.94.5

सु॒प॒र्णा वाच॑मक्र॒तोप॒ द्यव्या॑ख॒रे कृष्णा॑ इषि॒रा अ॑नर्तिषुः । न्य१॒॑ङ्नि य॒न्त्युप॑रस्य निष्कृ॒तं पु॒रू रेतो॑ दधिरे सूर्य॒श्वितः॑ ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.94.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इन पत्थरों का शब्द सुनकर ऐसा लगता है, जैसे आकाश में उड़ने वाले पक्षी शब्द कर रहे हों. ये पत्थर जंगल में घूमने वाले कृष्णसार हरिण के समान नाचते हैं. ये पत्थर पिसे हुए सोम को नीचे गिराते हैं एवं सूर्य के समान श्वेत वर्ण के जल को अधिक मात्रा में धारण करते हैं. (५)

EN English Translation

Hearing the words of these stones, it is as if the birds flying in the sky are saying words. These stones dance like krishnasar deer roaming in the forest. These stones bring down the crushed mons and hold a large amount of white colored water like the sun. (5)

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